निकाय चुनाव : एक दशक के सूखे के बाद फिर से निगम में कांग्रेस राज, 80 सीटों में 42 पर विजयी

बीकानेर, निडर इंडिया न्यूज। 

नगर निगम चुनाव में एक दशक के बाद फिर से निगम में कांग्रेस सत्ता पर काबिज होती दिख रही है। बीकानेर निगम क्षेत्र में 80 वार्डों के लिए हुए चुनावों में कांग्रेस ने 42 सीटे हासिल की है, जबकि बीजेपी 27 सीट पर ही सिमट गई है। वहीं स्वतंत्र प्रत्याशियों ने भी इस बार ताल ठोकी और दस सीटों पर काबिज हुए है। एक सीट रालोपा का खाता भी खुला।

लगातार दो बोर्ड में करारी शिकस्त झेलने वाली कांग्रेस ने इस बार जोरदार वापसी करते हुए 80 में से 42 वार्डों में जीत दर्ज कर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया। वहीं पिछले 10 साल से नगर निगम में सत्ता पर काबिज भाजपा का प्रदर्शन इस बार निराशाजनक रहा और पार्टी 27 सीटों पर ही सिमट गई।
कांग्रेस के लिए यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले दो नगर निगम चुनावों में पार्टी को लगातार हार का सामना करना पड़ा था। इस बार कांग्रेस ने न केवल वापसी की, बल्कि स्पष्ट बहुमत हासिल कर बोर्ड गठन के लिए निर्दलीयों के भरोसे रहने की जरूरत भी खत्म कर दी।

भाजपा नेताओं का  अति उत्साह भारी पड़ा

चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा में आत्मविश्वास कई जगह ओवर कॉन्फिडेंस में बदलता नजर आया। पार्टी ने अपने कई पदाधिकारियों और प्रमुख नेताओं को चुनाव मैदान में उतारा। टिकट वितरण के दौरान बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और दावेदार नाराज हुए। टिकट से वंचित कार्यकर्ताओं में से कई ने प्रचार से दूरी बना ली। इसका सीधा असर मतदान के दिन दिखा।

सूत्र बताते है कि इस करारी हार की एक वजह टिकट वितरण भी रही, जिसमें हुई गलतियां भी मानी जा रही हैं। कई वार्डों में स्थानीय और जातीय समीकरणों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। पार्टी के मजबूत दावेदारों की जगह ऐसे चेहरों को मौका मिला, जिन्हें लेकर कार्यकर्ताओं और स्थानीय मतदाताओं में उत्साह नजर नहीं आया।

 

 

इसका सबसे चर्चित उदाहरण महावीर रांका का टिकट प्रकरण रहा। रांका ने नामांकन तक दाखिल कर दिया था, लेकिन अंतिम समय में पार्टी का अधिकृत सिंबल किसी अन्य प्रत्याशी को दे दिया गया। इससे स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों में नाराजगी का माहौल बना। चुनाव परिणाम ने संकेत दिया कि इस तरह के फैसलों का भाजपा को कई वार्डों में नुकसान उठाना पड़ा।

 

 

42 सीटों का आंकड़ा कांग्रेस के लिए सिर्फ जीत नहीं, बल्कि 10 साल बाद सत्ता में मजबूत वापसी का संदेश है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस महापौर के लिए किस चेहरे पर दांव लगाती है और पार्टी के भीतर किस गुट का प्रभाव बोर्ड में नजर आएगा।
वहीं भाजपा के लिए 27 सीटों का परिणाम आत्ममंथन का विषय है।

 

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