एरच: जहाँ से शुरू हुई थी 'सत्य की विजय' की गाथा, नृसिंह जयंती पर विशेष आलेख - Nidar India

एरच: जहाँ से शुरू हुई थी ‘सत्य की विजय’ की गाथा, नृसिंह जयंती पर विशेष आलेख

निडर इंडिया न्यूज। 

 पी.शीतल हर्ष

 बुंदेलखंड की धरती केवल वीरों की गाथाओं के लिए ही नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के अटूट विश्वास और पौराणिक घटनाओं के लिए भी जानी जाती है। कानपुर से झाँसी के मध्य स्थित ‘एरच’ (Arech) नगरी एक ऐसा ही पावन धाम है, जिसे सतयुग की महान घटनाओं का केंद्र माना जाता है।

​दैत्यराज हिरण्यकश्यप की राजधानी
​इतिहास और पुराणों के अनुसार, एरच कभी असुर राज हिरण्यकश्यप की वैभवशाली राजधानी थी। यह वही स्थान है जहाँ अहंकार और भक्ति के बीच एक महान युद्ध हुआ था। हिरण्यकश्यप, जिसे ब्रह्मा जी से अजेय होने का वरदान प्राप्त था, ने स्वयं को ईश्वर मान लिया था और अपनी प्रजा को केवल अपनी ही पूजा करने का आदेश दिया था।

भक्ति और अत्याचार का संघर्ष
​इसी नगरी में जन्मा था भगवान श्री हरि का अनन्य भक्त—प्रह्लाद। अपने ही पिता के अत्याचारों को सहते हुए प्रह्लाद ने कभी विष्णु की भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा। एरच की पहाड़ियाँ और यहाँ से बहने वाली बेतवा नदी आज भी उन पलों की साक्षी हैं, जब बालक प्रह्लाद को ऊँची पहाड़ी से बेतवा की लहरों में फेंक दिया गया था। किंतु, जिसकी रक्षा स्वयं नारायण कर रहे हों, उसे काल भी नहीं छू सकता।

​होलिका दहन की मूल भूमि
​शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि पूरे भारत में मनाया जाने वाला ‘होलिका दहन’ का पर्व मूलतः इसी नगरी से जुड़ा है। एरच वह स्थान है जहाँ हिरण्यकश्यप की बहन होलिका, प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठी थी। अग्नि ने होलिका को भस्म कर दिया, लेकिन भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आए। यह घटना आज भी हमें सिखाती है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य के सामने वह अंततः राख हो जाती है।

​नरसिंह अवतार: कण-कण में भगवान
​जब हिरण्यकश्यप का अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया और उसने चुनौती दी कि “तेरा भगवान कहाँ है?”, तब एरच की इसी भूमि पर भगवान विष्णु ने ‘नरसिंह अवतार’ धारण किया। ब्रह्मा जी के वरदान की मर्यादा रखते हुए, भगवान ने न दिन में, न रात में, न अस्त्र से, न शस्त्र से, बल्कि खंभ फाड़कर प्रकट होकर अधर्म का नाश किया।

​आज एरच केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक जीवंत तीर्थ है। यह हमें याद दिलाता है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त है। यदि आपके भीतर प्रह्लाद जैसी अडिग भक्ति है, तो ईश्वर को खंभ फाड़कर भी अपने भक्त के वश में आना ही पड़ता है।

​हिरण्यकश्यप का घमंड उसकी उन शर्तों में छिपा था जो उसने ब्रह्मा जी से वरदान स्वरूप मांगी थीं। भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर प्रकृति के हर नियम और उस वरदान का मान रखा। न वह दिन का समय था, न रात का; वह संध्या काल की बेला थी। न उन्हें धरती पर मारा गया, न आकाश में; भगवान ने उन्हें अपनी जंघाओं (गोद) पर लेटाया। न अस्त्र का प्रयोग हुआ, न शस्त्र का; भगवान के तीखे नखों ने उस पापी के वक्षस्थल को चीर कर धर्म की पुनर्स्थापना की। एरच की वह सभा इस अलौकिक दृश्य की गवाह बनी, जहाँ खंभ फाड़कर प्रकट हुए ईश्वर ने सिद्ध किया कि वे सर्वव्यापी हैं।


​अधर्म के विनाश के पश्चात, दैत्यराज हिरण्यकश्यप की मृत्यु हुई और नियमतः भक्त प्रह्लाद को राज्य का उत्तराधिकारी बनाया गया। किंतु इतिहास का एक अत्यंत भावुक पक्ष यहाँ से आरंभ होता है। जिस समाज के कल्याण के लिए प्रह्लाद ने इतने कष्ट सहे, उसी समाज के एक वर्ग ने उन्हें ‘पितृहन्ता’ (पिता की मृत्यु का कारण) मानकर स्वीकार करने से मना कर दिया।
​समाज के इस व्यवहार और विरोध ने प्रह्लाद के हृदय को गहरा आघात पहुँचाया। जो भक्त संसार में केवल हरि को देखता था, उसे अपनों के ही बीच तिरस्कार मिला। सामाजिक बहिष्कार से दुखी होकर और राजपाट के मोह से कोसों दूर, भक्त प्रह्लाद ने अपनी जन्मभूमि और राजधानी एरच नगरी को त्यागने का कठिन निर्णय लिया।

​राजसी सुखों का त्याग कर प्रह्लाद उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ गए और मुल्तान (जो उस समय मूलस्थान के नाम से जाना जाता था) पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक ऊँचे टीले को अपना ठिकाना बनाया। वह स्थान आज भी प्रह्लाद के अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है।
​अपने जीवन का शेष संपूर्ण समय उन्होंने उसी टीले पर, आडंबरों से दूर, केवल और केवल हरि-कीर्तन और आत्मिक शांति में व्यतीत किया। मुल्तान का वह क्षेत्र आज भी उनकी तपस्या की खुशबू समेटे हुए है। एरच से मुल्तान तक की यह यात्रा एक राजकुमार के राजा बनने की नहीं, बल्कि एक भक्त के ‘परमहंस’ होने की गाथा है।

भक्त प्रह्लाद का जीवन हमें सिखाता है कि भक्ति का मार्ग फूलों की सेज नहीं है। समाज कभी-कभी सत्य को स्वीकार करने में समय लेता है, लेकिन सच्चा भक्त लोक-परलोक की चिंता छोड़कर केवल अपने आराध्य में लीन रहता है। एरच की वह मिट्टी और मुल्तान का वह टीला आज भी पुकार-पुकार कर कह रहे हैं कि विजय हमेशा सत्य की ही होती है।

आज तक एरच में हिरण्यकश्यप का किला मौजूद है जो कि खण्डहर में तब्दील है और मुल्तान में प्रहलाद के टीले के अवशेष है (कुछ वर्षों पूर्व ही पाकिस्तानी कट्टरपंथियों ने उस टीले को नुकसान पहुंचाया था)

रिपोर्ट : पी.शीतल हर्ष, कोलकाता

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