बीकानेर, निडर इंडिया न्यूज। 

ये मारा…वो लगा…छपाक…सटाक…की करतल गूंज। एक दूसरे की पीठ पर पानी से भरी डोलची से वार करते लोग। यह नजारा आज दोपहर को हर्षों के चौक में साकार हो रहा था। जहां पर रियासकाल से चली आ रही परम्परा का आज भी पुष्करणा समाज की हर्ष और व्यास जाति के लोगों ने निर्वाह किया।

इसके लिए हर्षों की ढलान पर दोनों तरफ पानी भरने के लिए बड़े-बड़े पात्र रखे गए। फिर चमड़े से बनी विशेष तरह की डोलची से हर्ष और व्यास जाति के लोगों ने एक दूसरे की पीठ पर पानी से वार किया। कहने को तो थी यह लड़ाई, लेकिन असल में तो इसमें डोलची में भरे पानी को प्रेम और सौहार्द के रूप् में एक-दूसरे पर बरासाया गया। पहली बार खेल का हिस्सा बनने वाले तो पानी की मार खाकर अचंभित रह गए।

हर्षों की ढलान पर एक तरफ एक जाति के लोग, तो दूसरी तरफ दूसरी जाति के लोग खड़े हुए। पानी के बड़े-बड़े कड़ाव भरकर रखे गए। जैसे ही पानी खाली होने लगता फिर से पानी के टैंकर आ जाते। पानी का यह अनुठा खेल दोपहर करीब दो बजे शुरू हुआ, जो लगभग डेढ़ से दो घंटे तक लगातार चला। बाद में गुलाल उछालकर खेल समाप्ति की घोषणा की गई।

खेल देखने उमड़ सैलाब

हर्ष-व्यास जाति का खेल देखने के लिए बड़ी संख्या में अन्य जातियों के गणमान्य लोग भी शामिल हुए। वहीं मोहल्ले की छतों पर महिलाओं और बच्चों का जमावड़ा रहा। बालिकाओं और बच्चों ने  जहां पानी से भरी थैलियां बरसाई, तो महिलाओं ने पूरे उत्साह के साथ अपने घरों की छतों से ही बाल्टियां भर-भर कर पानी उड़ेला। होली की मस्ती को पानी के खेल ने दुगना कर दिया।

अनुठी है परम्परा…

आपसी लड़ाई-झगड़े तो होते रहते है, उनमें समझौते भी होते हैं। लेकिन बीकानेरी की होली में हर्ष-व्यास जाति के लोगों में रियासतकाल में एक बार विवाद हो गया था, उस दौर में राजीनामा भी हो गया। उसी प्रेम और भाईचारे को प्रतीकात्मक रूप से आज भी याद किया जाता है और उसका परिणाम यह डोलची मार खेल है। ताकि युवा पीढ़ी इस परम्परा को समझ सके।

 

 

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