बीकानेर, निडर इंडिया न्यूज।



“गवरल पाछी आ…पाछी आ…रो मति गवरा हरियाला ईसर साथ…सरीखे गीतों पर थिरकती बालिकाओं ने आज दूसरे दिन भी गणगौर को विदा किया। परम्परा के अनुसार गणगौर भोळाने की रस्म आज भी निभाई गई। शनिवार को भी बड़ी संख्या में बालिकाओं ने गणगौर की विदाई की थी। वहीं आज रविवार को भी गली-मोहल्लों से गाजे-बाजे के साथ गणगौर को विदा की। आज भी जूनागढ़ से शाही सवारी निकाली गई, जो परम्परा के अनुसार चौतीना कुआं तक पहुंची। जहां पर बड़ी संख्या में गणगौर प्रतिमाओं को पानी पिलाने के लिए लाया गया। वहीं ढढ्ढों के चौक में मेला भरा जहां पर महिलाओं ने गणगौर की प्रतिमा के आगे नृत्य की अपनी मन्नत मांगी।
वहीं चौतीना कुआं, जस्सूसर गेट, गंगाशहर, नथूसर बास,नया कुआं सहित विभिन्न क्षेत्रों में गणगौर का मेला पूरे उल्लास के साथ भरा, जहां बड़ी संख्या में युवतियां और बालिकाएं पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुईं।

बालिकाओं ने विधि-विधान से गणगौर माता की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और मनचाहे वर की कामना की। इसके बाद गीत-संगीत और लोक परंपराओं के बीच गणगौर माता को विदाई दी गई। इस दौरान पारंपरिक गणगौर गीतों की मधुर ध्वनि से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
मेले में झूले और खान-पान की दुकानों पर बालिकाओं ने खान-पान का लुत्फ उठाया। वहीं युवतियों और बच्चों ने झूलों का आनंद लिया। शहर के विभिन्न हिस्सों में सुरक्षा और व्यवस्था के भी पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
ढड्ढा चौक में भरा मेला, महिलाओं ने किया नृत्य

ढड्ढा चौक में वर्षों पुरानी परंपरा के तहत लगने वाला गवर का मेला इस बार भी श्रद्धा और उल्लास के साथ आयोजित हुआ। रियासतकाल से चली आ रही इस अनूठी परंपरा में चांदमल ढड्ढा की गवर आभूषणों से सुसज्जित होकर श्रद्धालुओं को दर्शन दे रही है। शनिवार रात से शुरू हुआ दर्शन का क्रम रविवार दिनभर जारी रहा, जिसमें ढड्ढा हवेली में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।

ईशरजी के बजाय ‘भाया’ के साथ विराजती हैं गवरजा
इस मेले की सबसे खास बात यह है कि यहां पारंपरिक रूप से ईशरजी के स्थान पर ‘भाया’ गवरजा के साथ विराजमान रहते हैं। यह परंपरा इस आयोजन को अन्य स्थानों से अलग और विशिष्ट बनाती है, जिसे देखने दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।
कड़ी सुरक्षा के बीच होते हैं दर्शन…
मेले के दौरान गवरजा की सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन मुस्तैद रहता है। श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने और व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं, जिससे दर्शन सुचारू रूप से संपन्न हो सकें।
सेवा और समर्पण का संगम…
मेले में अनेक लोग अपनी सेवाएं देते नजर आते हैं। कोई जल व्यवस्था संभालता है तो कोई श्रद्धालुओं के लिए अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराता है। यह आयोजन सामाजिक सहयोग और सामूहिक आस्था का भी प्रतीक बन गया है।
गूंजता है घूमर का सुर, दिखती है संस्कृति की झलक
गवरजा के सामने महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में घूमर नृत्य करती हैं, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर हो उठता है। लोकगीतों और नृत्य के साथ यह मेला केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव का रूप भी ले लेता है।
ढड्ढा चौक का यह मेला हर साल आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है, जो नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़े रखने का कार्य कर रहा है।
“रियासतकाल से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाना हमारा सौभाग्य” : यशवंत कोठारी
मेले के आयोजक यशवंत कोठारी ने बताया कि ढड्ढा चौक का यह गवर मेला वर्षों पुरानी परंपरा का प्रतीक है, जिसे आज भी पूरे श्रद्धा और विधि-विधान के साथ आयोजित किया जाता है। उन्होंने कहा कि चांदमल ढड्ढा की गवर के दर्शन के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, जो इस आयोजन की महत्ता को दर्शाता है।
उन्होंने बताया कि मेले में सुरक्षा, व्यवस्थाओं और श्रद्धालुओं की सुविधा का विशेष ध्यान रखा जाता है। साथ ही स्थानीय लोग भी बढ़-चढ़कर सेवा कार्यों में भाग लेते हैं, जिससे यह आयोजन सामूहिक सहयोग का उदाहरण बन गया है। यशवंत कोठारी ने कहा कि इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और इसकी गरिमा बनाए रखना ही उनका मुख्य उद्देश्य है।
शुरू हुआ धींगा गणगौर का पूजन…
विवाहिता महिलाओं ने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए रविवार से धींगा गणगौर पूजन शुरू किया। घरों में दीवार पर धींगा गणगौर की आकृति उकेर कर उसका पूजन शुरू किया। यह धींगा गणगौर पूजन एक पखवाड़े तक चलेगा। इसमें महिलाएं प्रतिदिन श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना कर अपने परिवार के कल्याण की कामना करेंगी।
फोटो: एसएन जोशी।






