शख्सियत : शास्त्रीय संगीत तो दैविक है, भले ही कैसा भी दौर आए यह तो रहेगा : डॉ.सुरुचि मोहता, देखें वीडियो... - Nidar India

शख्सियत : शास्त्रीय संगीत तो दैविक है, भले ही कैसा भी दौर आए यह तो रहेगा : डॉ.सुरुचि मोहता, देखें वीडियो…

 

मुम्बई प्रवासी गायिका डॉ.सुरुचि मोहता ने बीकानेर आगमन पर निडर इंड़िया से की खास बातचीत, बोली संगीत एक साधना है, बीते 35 साल से कला-साहित्य जगत में सक्रिय है

रमेश बिस्सा।

बीकानेर, निडर इंड़िया न्यूज। 

संगीत जगत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। देश में आज शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत में कई ख्यातिनाम कलाकार अपने स्वरों का जादू बिखेर रहे हैं। इनमें कई कलाकार ऐसे भी है जो संगीत साधना को ही ईश्वरीय साधना और पूजा मानते हैं। ऐसी ही विरली शख्सियत और बहुमुखी प्रतिभा है डॉ.सुरुचि मोहता।

मुम्बई प्रवासी मोहता शास्त्रीय संगीत की विधा से बीते  35 साल से जुड़ी है। बीते दिनों बीकानेर आने पर उन्होंने शास्त्रीय संगीत कला पर निडर इंड़िया से खास बातचीत की। इस दौरान डॉ.सुरुचि मोहता ने बताया कि शास्त्रीय संगीत एक तरह से दैविक की है। ऐसे में किसी भी दौर में हमेशा ही कायम रहेगा।

जबलपुर में जन्मी डॉ.सुरुचि मोहता 

डॉ.सुरुचि मोहता बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी हैं। संगीत के अलावा वे लेखिका, गायिका, संगीतज्ञ, गीत नियोजक, आयोजक, उद्यमी, कला समन्वयक, संस्थापिका व गृहणी हैं। डॉ.मोहता 24 जुलाई 1967 को जबलपुर में जन्मीं सुरुचि ने कौमुदी मुन्शी से उप शास्त्रीय – ठुमरी, दादरा,होरी, कजरी, गीत गजल शैलियों की बारिकियां सीखी है। बनारस घराने की पारम्परिक बंदिशें और गायन शैली को अपनी गुरु के मार्गदर्शन में अच्छी तरह साधा है। वे आकाशवाणी की स्तरीय गायिका है।

उद्योगपति परिवार से है, मन में संगीत में रचता बसता है…

डॉक्टर सुरुचि मोहता एक ऐसे परिवार से हैं जो मूलतः तो उद्योगपति है किंतु शिक्षा, संस्कृति,संगीत, अध्यात्म और समाज सेवा के क्षेत्र में सदैव ही अग्रणी रहा है। अहमदनगर उनके परिवार का आचार, व्यवहार और संस्कार पूरी तरह भारतीय संस्कृति का संरक्षक और अनुकर्ता रहा है। आप ख्यातिनाम साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी सेठ गोविंददास की प्रपौत्री हैं। ऐसे में साहित्य और कला तो आपके रग-रग में बसता है।

डॉ. सुरुचि मोहता के व्यक्तित्व का अनोखा वैशिष्ट्य है कि आपको जहाँ माँ शारदा ने मधुर और ललित कंठ दिया है, वहीं पर आप संवेदनशील कवयित्री, संगीत निर्देशक और साहित्यिक विश्लेशक भी हैं। आपने कई पौराणिक विषयों को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करने के लिए स्क्रिप्ट भी लिखी हैंऔर उसका सफल मंचन भी कराया है ।

साहित्य संगीत की आत्मा है…

आपका मानना है कि साहित्य संगीत की आत्मा है। कई साहित्यिक व लोक विषयों पर उन्होंने कार्यक्रम रचे हैं। साथ ही अपनी सांगीतिक प्रस्तुति भी दी है। इसमें अष्टनायिका, सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, कबीर, अष्टसखा, रसखान, रहीम, ताज बीबी, भक्तिकाल का साहित्य, रामकथा, लीलापुरुष श्री कृष्ण, रामकथा के स्त्री पात्र, काव्य श्रृंगार, छायावाद, कालिदास, राजस्थानी लोक संगीत, उत्तरप्रदेश लोक संगीत, मराठी अभंग व संत साहित्य, बच्चों के गीत, कहानियां व साहित्यिक गोष्ठियों द्वारा उन्होंने चरित्र निर्माण और उदात्त जीवन शैली की तरफ कलात्मक संकेत दिया है।आप भक्ति साहित्य का भाव गांभीर्य के साथ शास्त्रीय गायन कर रही हैं। एक सुधी अध्येता होने के कारण आप बड़े ही कौशल से गीतों में निहित आध्यात्मिक मर्म का उद्घाटन भी करती हैं।

अंग्रेजी भाषा में पुस्तक भी प्रकाशित…

भावमयी आध्यात्मिक चेतना की मार्मिक अभिव्यक्ति से परिपूर्ण आपकी एक अंग्रेजी पुस्तक ‘वाह प्रभु’ भी प्रकाशित हुई है जो मनोभावों, मनोग्रंथियों, मनोल्लादों के स्वानुभूत पदों का अभिव्यंजन हुआ है। कला, संस्कृति, साहित्य और संगीत के क्षेत्र में आपकी सम्भावनाएँ असीम हैं। ‘वाह प्रभु’ में उनके आध्यात्मिक-कलात्मक विचारों को रखा गया है।

संगीत में  पीएचडी की उपाधि…

एस.एन.डी.टी युनिवरसिटि से ही डॉ नीरा ग्रोवर के मार्गदर्शन में ‘Concept of Ashtanayika in different forms of Indian Classical Music’ इस विषय पर शोध ग्रंथ लिखकर पीएच डी कि उपाधि प्राप्त की है । उनकी पीएचडी थीसिस को शीर्ष शिक्षाविदों से बहुत सराहना मिली है और वह अष्टनायिका (जो 2500 ईसा पूर्व का विषय है) पर एक व्यापक पुस्तक पर काम कर रही हैं, संगीत, कला, संस्कृति के विषयों पर उनके लेख संगीत पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।

उन्होंने अहमदनगर महाविद्यालय से बी.कॉम की उपाधि की, किन्तु उनका झुकाव शुरू से ही संगीत की ओर रहा । बी.कॉम का अध्ययन करने के साथ ही आपने गंधर्व महाविद्यालय की विशारद उपाधि भी प्राप्त कर ली । बंबई आने पर सुश्री सरला और मुक्ता भिड़े से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली, आपने संगीत में एस.एन.डी.टी विश्वविद्यालय से एम.ए की उपाधि प्राप्त की ।

हिन्दी साहित्य के प्रति रहा है रुझान…

वरिष्ठ साहित्यकार व लेखक डॉक्टर रामजी तिवारी का आत्मीय मार्गदर्शन और प्रोत्साहन आपके व्यक्तित्व विकास और साहित्यिक रुचि संवर्धन में विशेष महत्वपूर्ण रहा । हिंदी साहित्य के प्रति हमेशा उनका रुझान रहा है। उन्होंने कई गीत व लेख लिखे हैं संगीत और साहित्य के मणि कांचन योग से सजीं उनकी सभी रचनाओं में दार्शनिक-कलात्मक दृष्टिकोण नज़र आता है, चाहे वह सांगीतिक हो या साहित्यिक। संगीत आपके लिए साधना और आत्मसंतोष का विषय है । और जब भी कभी वे गायन करती हैं तो उनका उद्देश्य होता है एक नए रचनात्मक वातावरण का निर्माण करना ।

पद्मा बिनानी फाउण्डेशन की आप बीस साल तक Creative Director रहीं, यह फाउण्डेशन भारतीय संगीत- संस्कृति और साहित्य के संरक्षण और विकास के लिए संकल्पित है । यहाँ पर आपने अनेक स्मरणीय कार्यक्रम आयोजित किये, संगीत के एल्बम तैयार किए और बच्चों के लिए अनेक रोचक गीत लिखकर सी.डी बनाई। मुंबई की अनेक गौरवशाली संस्थाओंके लिए आपने कार्यक्रम आयोजित किए और गायन किया।

इसके अलावा ‘सप्तम स्वर’ नाम की इनकी अपनी संस्था है । जिसके माध्यम से कला और संगीत से संबंधित कार्यक्रमों का आयोजन आप अपने देश में भी नहीं, विदेशों में भी आयोजित कर चुकी हैं।

मिला है कई संस्थाओं से सम्मान…

एक मारवाड़ी परिवार और समाज में जन्मीं , उन्हें कोलकत्ता के ‘मारवाड़ी युवा मंच’, अहमदनगर के ‘सरगम मंडल’ द्वारा व् समाज की अन्य संस्थाओं द्वारा, एक संगीतकार और विद्वान के रूप में पहचान बनाने के लिए मान्यता और पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।वह अत्यधिक सोशल मीडिया एक्सपोज़र के इस युग में भी लो प्रोफाइल बनाए रखती है,  कला, संगीत, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में योग्य योगदान देने में विश्वास करती है।

 

 

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