बीकानेर, निडर इंडिया न्यूज।

भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जोधपुर, सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के पीडियाट्रिक विभाग और बीकानेर पीडियाट्रिक सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को “दुर्लभ बीमारियां: कारण एवं उपचार” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। रानी बाजार स्थित होटल में हुई कार्यशाला में बाल एवं शिशु रोग विशेषज्ञों, प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों और रेजिडेंट चिकित्सकों ने सक्रिय सहभागिता की।
इस मौके पर विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. जी. एस. तंवर ने राजस्थान में दुर्लभ रोगों की वर्तमान स्थिति का विस्तृत अवलोकन प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि विश्वभर में लगभग 35 करोड़ लोग दुर्लभ रोगों से प्रभावित हैं, जिनमें से लगभग 20 प्रतिशत भारत से हैं। वर्तमान में विश्व स्तर पर लगभग 7,000 दुर्लभ रोगों की पहचान की जा चुकी है, किंतु इनमें से केवल 63 रोगों के लिए ही स्वीकृत उपचार उपलब्ध हैं। उन्होंने बताया कि लगभग 80 प्रतिशत दुर्लभ रोग आनुवंशिक (जेनेटिक) होते हैं तथा किसी रोग को दुर्लभ तब माना जाता है जब वह 2,000 व्यक्तियों में से एक को प्रभावित करता हो।

डॉ. तंवर ने दुर्लभ रोगों के निदान में आने वाली “डायग्नोस्टिक ओडिसी” की समस्या पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सही निदान तक पहुँचने में बच्चों के जीवन के 7 से 10 वर्ष व्यर्थ हो जाते हैं। इसके कारण बचपन का महत्वपूर्ण समय बिना उचित उपचार के बीत जाता है और कई बच्चों को गलत रूप से लंबे समय तक बीमार मान लिया जाता है। उन्होंने चिकित्सकों से दुर्लभ रोगों के प्रति उच्च स्तर की नैदानिक सतर्कता रखने तथा समय पर उचित संस्थान में रेफरल सुनिश्चित करने का आह्वान किया। उन्होंने यह भी कहा कि बाल रोग विशेषज्ञों एवं अन्य चिकित्सकों में दुर्लभ रोगों के प्रति सामान्य ज्ञान और जागरूकता बढ़ाकर ही शीघ्र पहचान और बेहतर उपचार संभव है।
कार्यक्रम में अतिरिक्त प्राचार्य डॉ. एन. एल. महावर ने एम्स जोधपुर में दुर्लभ रोगों के लिए उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना के लिए डॉ. कुलदीप सिंह को बधाई दी , साथ ही सफल आयोजन के लिए प्रो. डॉ. जी. एस. तंवर के अकादमिक नेतृत्व की सराहना की।
एम्स जोधपुर से डॉ. कुलदीप सिंह और उनकी टीम ने दुर्लभ रोगों पर वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि दुर्लभ बीमारियों की पहचान, उपचार और रोकथाम के लिए चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आम जन में जागरूकता अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि भारत एवं राजस्थान सरकार दुर्लभ रोगों से पीड़ित बच्चों के उपचार के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से आर्थिक सहयोग प्रदान कर रही हैं, किंतु अंधविश्वास, अधिक खर्च और समय की भ्रांतियों के कारण कई परिवार सही उपचार नहीं करवा पाते। समय पर पहचान और सही उपचार से ऐसे बच्चे सामान्य जीवन जी सकते हैं।
डॉ. कुलदीप सिंह ने शोधपूर्ण स्लाइड प्रस्तुति के माध्यम से दुर्लभ रोगों के कारण, निदान और उपचार की विस्तृत जानकारी दी और उपस्थित चिकित्सकों के प्रश्नों के उत्तर दिए। उन्होंने एम्स जोधपुर द्वारा दुर्लभ रोगों के लिए उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं की भी जानकारी साझा की।
अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. वरुणा व्यास ने कहा कि दुर्लभ बीमारियां समाज के लिए भले ही दुर्लभ हों, किंतु प्रभावित परिवारों के लिए यह एक गंभीर वास्तविकता होती है। सही जांच एवं परामर्श से न केवल रोगी को उपचार मिल सकता है, बल्कि भविष्य में परिवार में किसी अन्य बच्चे को इससे बचाया जा सकता है।
डॉ. चारू शर्मा ने गर्भावस्था के दौरान भ्रूण जांच के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नियमित प्रसव-पूर्व जांच एवं समय पर परामर्श से कई दुर्लभ बीमारियों की रोकथाम संभव है। वहीं डॉ. सीताराम डीडेल ने दुर्लभ रोगों की पहचान एवं उपचार से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदु साझा किए।
डॉ. जी. एस. तंवर ने बताया कि राजस्थान से अब तक 302 मरीजों का पंजीकरण आईसीएमआर में किया गया है, जिनमें से लगभग 50 प्रतिशत मामले ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (DMD) के हैं। इसके लिए प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को नियमित डीएमडी क्लिनिक संचालित किया जाता है, जहां मरीज पंजीकरण करवा सकते हैं। मुख्यमंत्री आयुष्मान बाल संबल योजना के तहत राजस्थान सरकार द्वारा प्रभावित बच्चों को प्रति माह 5,000 रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।
कार्यशाला में अनेक वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञों ने भाग लिया, जिनमें डॉ. पी. सी. खत्री, डॉ. सी. के. चाहर, डॉ. पी. के. बेरवाल, डॉ. रेणु अग्रवाल, डॉ. गौरव गोंबर, डॉ. श्याम अग्रवाल, डॉ. मुकेश बेनीवाल, डॉ. सारिका स्वामी, डॉ. एम. जी. चौधरी, डॉ. पवन दारा, डॉ. विजय चलाना, डॉ. अनिल दूसा, डॉ. ओ. पी. चाहर, डॉ. गौरी शंकर जोशी, डॉ. गिरीश प्रभाकर, डॉ. मोहन काजला, डॉ. कुलदीप बिठू, डॉ. महेश शर्मा, डॉ. संतोष खजोटिया, डॉ. संतोष चांडक, डॉ. स्वाति कोचर एवं डॉ. मोनिका सोनी शामिल रहे।
कार्यशाला के महत्व पर डॉ. अनुभव चौधरी, डॉ. दिव्या एवं डॉ. साक्षी ने अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर कार्यशाला में योगदान देने वाले चिकित्सकों, विशेष रूप से डॉ. कुलदीप सिंह, का साफा, शाल एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मान किया गया।





